22 Jul 2013

नींद

कितने भी आराम के सुख साधन जुटा लीजिए , बचपन की वो बेफिक्र नींद फिर नहीं मिलने वाली | 
वो नींद जो आँखों की कोरों में सोती रहती है , हमारे उठने के बाद भी , 
वो नींद जो तकिये पर अपनी निशानी छोड़ जाती है , वो बेफिक्र नींद फिर नहीं मिलने वाली :( 

 
झुकती सी अँखियाँ ,
जम्हाती बतियाँ ,
नाजुक से गालों पे तकिये की छाप ,
आँखों की कोरों ,
में नींदें सोयीं ,
होठों की कोरों से बहती सी लार |

कुछ देर तक ,
नींद से लड़ना ,
फिर हार कर धम्म से तकिये पे गिरना ,
माँ का बुलाना ,
आवाज देकर ,
झुंझला के तकिये से कानों को ढंकना |

कुछ देर सोना ,
सोने को रोना ,
जल्दी से एक ख्वाब ,
आँखों में बोना ,

फिर से , मैं हर रात , ये मांगता हूँ ,
वो नींद , इक रात , फिर से तो आये ,
सोऊँ मैं , फिर से , बच्चा हूँ जैसे ,
कोई ख्वाब , प्यारा सा , फिर से तो आये ,
मैं रात भर , कितना बेफिक्र सोया ,
फिर गाल पर उसकी निशानी दिखे ,
नींद पलकों पे बैठे , फिर ओस बनकर ,
खोलूं तो औंघाता पानी दिखे ,

दो मिनट देर तक ,
अब भी सोता हूँ पर ,
अब मुझे कोई आकर जगाता नहीं ,
कानों पे तकिया ,
रखता हूँ अब भी ,
प्यार से कोई उसको हटाता नहीं |

फिर बुलाए कोई ,
फिर जगाये कोई ,
मुझको गोदी में फिर से ,
उठाये कोई ,
फिर कोई रात हो ,
मेरी माँ साथ हो ,
फिर मैं बचपन जियूं ,
उससे फिर जिद करूँ –
“दो मिनट तो ठहर ,
माँ ,
मैं उठता हूँ न | ”
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26 Mar 2013

होली


होली, एक ऐसा त्यौहार जिसमें चेहरे पर लगा रंग सारे भेद मिटा देता है | होली के दिन सब हंसी-मजाक माफ होता है (बशर्ते कि वो दायरे से बाहर न हो) | 
काश कि हर दिन ऐसा ही खुशियों से भरा होता -

दोहा-

होली का असली मजा, यारों के संग आये|
और, 
इतना मलो गुलाल कि, रंग भेद मिट जाए|| 

धरती ने किया सिंगार , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
और, 
बरसे प्यार दुलार , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

सखियाँ बैठीं अवध की नगरिया , 
कान्हा के संग है सौतन मुरलिया , 
तभी.. 
आई बिरज से धार , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
सभी.. 
हो गयीं लालम-लाल , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

काहे रे पड़ोसी काहे इतना सरमाये , 
होरी के रंग से काहे खुद को बचाये , 
चल.. 
निकल दुआरे आ , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
हमरी, 
भौजी का सामने ला , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

आज नहीं कउनो छिपना-छिपाना , 
बीवी का रंग सारी को लगाना , 
हमरा.. 
सारी पे आधा अधिकार , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
बीवी.. 
गुस्से से हो गयी लाल , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

हम सब की महफ़िल मा भांग चले , 
हाँ जी, भांग चले , 
अरे, भांग चले, 
और, दद्दू की महफ़िल मा ज्ञान चले , 
भैया ज्ञान चले , 
आजहू , ज्ञान चले , 
आज.. 
ज्ञान को चूल्हे में डाल , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
दिल से.. 
दिल पे मलो गुलाल , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

संग मिल सबका हँसना-हँसाना, 
कउन है अपना , कउन बेगाना , 
रंग.. 
ढँक गया ये आकाश , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
रोज.. 
ऐसी खुशी हो काश , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

बरसे प्यार-दुलार, 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
हाँ,, 
धरती ने किया सिंगार , 
कि होरिया मा रंग बरसे |
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सभी को होली की अग्रिम  और असीम शुभकामनायें |

27 Feb 2013

उदास नज्म


कल रात जब जिक्र चला कुछ उदास नज्मों का, तो

तुमने डायरी के कुछ उनींदे पन्ने पलटे,

देर रात सोयी कुछ गजलों को जगाया,

कुछ मिसरों को पढ़ा, 

और एक मोड़ पर जाकर अचानक ठिठक सी गयी,

लिखा था,

“कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता |”

अतीत की शाख से कुछ फूल चुने तो थे हमने,

मगर सब मुरझाए हुए ही क्यूँ,

कुछ नयी कोंपलें भी थीं , कुछ खिले फूल भी थे,

आज सुबह हम खिले हुए फूल चुनेंगे,

आज सुबह हम कुछ खुशनुमा सी बात करेंगे ||
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