उस सुबह जब आँख खोलीं , थीं लकीरें
किसने आखिरकार खींची ये लकीरें ,
कल तलक हम साथ हँसते , साथ रहते
आज दोनों को अलग करतीं लकीरें ||
साथ थे , पर आज से दोनों अलग हैं ,
अब नहीं वो शाम की महफ़िल सजेंगीं ,
उस राह पर तो आज भी निकलेगा तू , पर
अब नहीं वो राह मेरे घर रुकेंगीं ,
चौपाल पर बैठूंगा जाके रोज , लेकिन
अब नहीं साझे की वो चिलमें जलेंगीं,
प्यार अपना आज कम लगने लगा है ,
प्यार से शायद बड़ी हैं ये लकीरें ||
इस साल भी रमजान होगा घर हमारे ,
और सेवैयों की महक रुकेंगीं कैसे ,
इस साल भी होली का रंग तुझ पर गिरेगा ,
रंगों को , खिंची धुंधली लकीरें दिखेंगी कैसे ,
इस साल भी तो जन्मदिन होंगे हमारे ,
और दुआएं सरहदों में बंधेंगी कैसे ,
कल तलक खुशियाँ और गम सब बांटते थे ,
किस तरह इनको भी रोकेंगी लकीरें ||
आज भी घर से निकल , कुछ छोटे बच्चे
आवाज सरहद पार शायद दे रहे हैं ,
आज भी सब साथ ही खेलेंगे कंचे ,
लकीरों को पार करते दिख रहे हैं ,
सरहदें हैं बीच में उनको फरक क्या ,
आज भी सब एक जैसे लग रहे हैं ,
हम भी लकीरों पर ही अब बैठा करेंगे ,
किस तरफ के हैं बता दें , फिर लकीरें ||
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