“आकाश” के उस पार ,
चलो घूमकर आते हैं ,
खिलती मुस्कानों के पीछे ,
कुछ दबा हुआ सा है शायद ,
चलो देखकर आते हैं ,
गहरा घुप्प अँधेरा है ,
पर एक किरण झिलमिल सी है ,
उसे उठाकर लाते हैं ,
नफरत तो काफी देख चुके ,
कुछ प्यार बचा है थैली में
,
आओ उसको फैलाते हैं ,
बादलों की ओट में ,
कोई रूठकर बैठा है शायद ,
जाकर उसे मनाते हैं ,
“आकाश” के उस पार ,
चलो घूमकर आते हैं ||
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