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2 Nov 2012

बाल-लीला

मेरी माँ की बनायी एक तस्वीर को देखकर अचानक ही कुछ लिखने लगा | बेशक तस्वीर के साथ न्याय नहीं कर पाया हूँ | लेकिन उनके आशीर्वाद से कुछ टूटा-फूटा लिखा तो है |

मेरी पसंदीदा तस्वीर
(वो कहते हैं न , तस्वीरें बोलती हैं)
ये पूरी रचना मैंने अपनी माँ के नजरिये से लिखी है तो इसकी नायिका वो ही होंगीं -

आज रात को कान्हा जी , सपने में मेरे आये ,

देखे तिरछी चितवन करके , मंद-मंद मुस्काए ,

बोले माई माखन दे दे , तेरा ही हो जाऊं ,

जो लीला तू देखन चाहे , वो तोहे दिखलाऊं ,

मैं सोची ये भाग्य हैं मेरे , कान्हा यहाँ पधारे ,

कुछ माखन के बदले ले लूँ , यश-वैभव मैं सारे ,

ये तो हैं साक्षात् प्रभू , जो मांगूं वो दे देंगे ,

दुःख-दारिद्र्य औ कष्ट सभी , पल में ये हर लेंगे ,

धन-दौलत की कमी न होगी , जग में होगा नाम ,

मटकी भर माखन के बदले , इतना बड़ा ईनाम ,


हरसाई , कुछ सकुचाई सी , मटकी तो ले आई ,

पर न जाने फिर क्या सूझा , उसको न दे पाई ,

ठिठक गए फिर कदम वहीँ पर , मन में उठा विचार ,

फिर देखी मोहन की सूरत , गिरी अश्रु की धार ,

वो मीठे पानी का सागर थे , और मुझ मूरख ने क्या माँगा ,

अपनी प्यास बुझाने को , बस इक अंजुली भर जल माँगा ,

हुआ सत्य का ज्ञान मुझे , सही समय पर मति डोली ,

मटकी फिर से वापस रख के , मन ही मन मैं ये बोली ,


हे लीलाधर , अब तुम मुझको परमानंद का भान कराओ , 

जो सबसे अनुपम लीला हो , आज वही मुझको दिखलाओ ,

नहीं मुझे यश और वैभव दो , नहीं मुझे धनवान करो ,

बालरूप अपना दिखला दो , इतना सा एहसान करो ,


जाने क्या मन में सूझी , छड़ी उठाकर डांटा उसको ,

तू तो माखनचोर है कलुए , क्यूँ अपना माखन दूँ तुझको ,

चल भाग यहाँ से वरना तेरी , मैया को बुलवाऊँगी ,

घर-घर माखन चोरी करता , ये सबको बतलाऊंगी ,

ये सुनकर वो श्याम-सलोना , जाने क्यूँ क्षण भर मुस्काया ,

फिर आँखों में आंसूं भर के , हठी-बाल का रूप दिखाया ,

वर्णन की सीमा के बाहर , इतना सुन्दर दृश्य हुआ ,

रोता हुआ कन्हैया था बस , और सब कुछ अदृश्य हुआ ,


सर पर सुन्दर मोर मुकुट था , कानों में अनुपम कुंडल ,

श्याम वर्ण की अतुल छटा थी , घुंघराले बालों का दल ,

गले एक मुक्तक माला थी , श्वेत मोतियों से संवरी ,

दिव्य नील-कमल के ऊपर , ओस-बूँद जैसे बिखरी ,

नीले अम्बर पर सूरज की , पहली रश्मि गिरी हो जैसे ,

उससे भी सुंदर उस पर , पीताम्बर सजता था ऐसे ,

देवलोक से रत्न मंगाकर कमर-करधनी बनवाई थी ,

उस पर प्यारे मोहन ने , एक अद्भुत वंशी लटकाई थी ,

मानों सब अलंकारों ने मिलकर , अपना सम्मान बचाया हो ,

मोहन पर सजकर , उसको ही , अपना श्रृंगार बनाया हो ,


मैं तो उसी दृश्य सुख में , इतने गहरे तक जा अटकी ,

जाने कब मोहन आ पहुंचा , वहाँ जहां रखी थी मटकी ,

घुटनों बल विचरण करता , माखन तक पहुंचा छैल-छबीला ,

बालरूप की ये लीला ही , उसकी सबसे अनुपम लीला ,

मटकी को तिरछा करके , उसमे अपना हाथ घुसाया ,

कुछ खाया , कुछ मुंह पर चुपड़ा , और कुछ धरती पर बिखराया ,

आँखों में प्रेमाश्रु भर के , मैंने उसे पुकारा ,

एक बार पुनः तिरछी चितवन से , उसने मुझे निहारा ,

एक हलकी सी मुस्कान चलायी , मुझ पर जादूगर ने ,

परमानंद दिया मुझको , उस नन्हे मोहन ने ,

पास गयी मैं उसके बरबस , गोदी में उसे उठाया ,

सौभाग्य था मेरा , मैंने , अपने हाथों से उसे खिलाया ,

वो जी भर के दुलराया मुझसे , मैंने भी मन भर के लाड़ किया ,

छक कर माखन खाया उसने , शेष मुझे प्रसाद दिया ,


तभी हिलाया मुझे किसी ने , नींद अचानक टूट गयी ,

दिवास्वप्न की रात , सुबह के साथ ही पीछे छूट गयी ,

जब उठी नींद से तो पाया , होठों पर जैसे कुछ खट्टा था ,

मोहन ही जाने स्वप्न था वो , या फिर किस्सा सच्चा था ,

बस एक और अर्जी सुन लो , जो विश्वास है तुम पर न छूटे ,

जब पुनः कभी तुम स्वप्न में आओ , वो स्वप्न कभी फिर न टूटे ||
.
तस्वीर और कविता दोनों का श्रेय - श्री मती विजय श्री मिश्रा
.