तुमने डायरी के कुछ उनींदे पन्ने पलटे,
देर रात सोयी कुछ गजलों को जगाया,
कुछ मिसरों को पढ़ा,
और एक मोड़ पर जाकर अचानक ठिठक सी गयी,
लिखा था,
“कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता |”
अतीत की शाख से कुछ फूल चुने तो थे हमने,
अतीत की शाख से कुछ फूल चुने तो थे हमने,
मगर सब मुरझाए हुए ही क्यूँ,
कुछ नयी कोंपलें भी थीं , कुछ खिले फूल भी थे,
आज सुबह हम खिले हुए फूल चुनेंगे,
आज सुबह हम कुछ खुशनुमा सी बात करेंगे ||
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