जो सूनी गली में कोई शोर मचता ,
जो मुर्दों के घर में कोई रोज जगता ,
जब इंसा की नीयत न सिक्कों से तुलती ,
जब किस्मत की कुण्डी भी मेहनत से खुलती,
मैं फिर से समझता ये आगाज तो है ,
नए इक सफर का ये अंदाज तो है ||
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जो सीली हुई थीं , मशालें वो जलतीं ;
जो सिमटी हुई थीं , आवाजें वो उठतीं ;
जब फिर से निकलता, कभी लाल सूरज ;
जब मंदिर में मिलती , कोई सच्ची मूरत ;
मैं फिर से समझता ये आगाज तो है ,
नयी इक सुबह का ये अंदाज तो है ||
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कभी “काश” दिल में समंदर उफनता ;
कभी “काश” फिर वो दीवारें दरकतीं ;
कभी चीखता दूर बैठा हिमालय ;
कभी चाँद से “काश” ज्वाला निकलती ;
मैं फिर से समझता ये आगाज तो है ;
नयी जिंदगी का ये अंदाज तो है ||
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