लेकिन क्या हम जिस मंजिल के पीछे दौड़ रहे , वास्तविकता में वही हमारी मंजिल है ?
क्यूँ हम में से ज्यादातर उस काम को कर रहे हैं जिसमें उनका मन ही नहीं लगता ?
क्या भेड़ की तरह आँख मूंदकर बस चल भर देने से मंजिल मिल जायेगी ?
कभी चंद लम्हों को रुक कर तो देखो ,
आँखों पे पलकों को ढँक कर तो देखो ,
बहुत खूबसूरत है ख्वाबों की दुनिया ,
ख्वाबों में रंगों को भरकर तो देखो ,
मंजिल को पाने का मतलब हमेशा ,
ख्वाबों को अपने भुलाना नहीं है ,
तेरी आँखें जागी हैं इतना सफर में ,
कि सोने का मतलब तो जाना नहीं है ||
सफर कितना लम्बा , तुझे ये पता है ?
सफर कौन तेरा , क्या ये जानता है ?
तेरी कौन मंजिल , कभी सोच पाया ?
क्या सपनों को ढंग से कभी देख पाया ?
चलता तो है भेड़ भी मस्त होकर ,
मगर सिर्फ चलना ही पाना नहीं है ,
तेरी आँखें जागी हैं इतना सफर में ,
कि सोने का मतलब तो जाना नहीं है ||
जिस पर सभी चल रहे आँख मूंदे ,
उसी राह चलना जरूरी नहीं है ,
सभी का सफर उतना अच्छा हो ; शायद ,
सभी के लिए ये जरूरी नहीं है ,
तेरी क्या खुशी है ; कभी खुद से पूछो ,
कभी अपने रस्ते भी ; चलकर तो देखो ,
मंजिल तो प्यारी लगेगी ; मगर ,
रास्ता खुद-ब-खुद एक साथी लगेगा ,
तू चल तो पड़ा है ; मूक बनकर डगर ; वो ,
जिसे आज तक अपना माना नहीं है ,
तेरी आँखें जागी हैं इतना सफर में ,
कि सोने का मतलब तो जाना नहीं है ||
ये पल ; एक पल में गुजर जायेगा ,
तू क्यूँ अगले पल के भरोसे टिका है ,
कितने बड़े सूरमा भी हुए हैं ,
ये पल आज तक न किसी को रुका है ,
अभी ये जो पल है ; यही तेरा पल है ,
तू जी ले तेरी जिंदगी आज इसमें ,
नहीं सोच अगला कोई पल मिलेगा ,
बचे ख्वाब अपने जियेगा तू जिसमें ,
उसे मान मंजिल जिसे दिल भी माने ,
तो हर पल में फिर से उम्मीदें जगेंगी,
तेरी जिंदगी है ; तुझी को है जीना
मगर “सिर्फ जीना” ही जीना नहीं है ,
तेरी आँखें जागी हैं इतना सफर में ,
कि सोने का मतलब तो जाना नहीं है ||
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