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25 Jan 2013

पतंग


पतंगों का मौसम है | कल गणतंत्र दिवस भी है | एक ख्वाहिश है, जो शायद बहुत सारे दिलों में होगी -

मुहब्बत के मांझे से कसकर बंधी हो,
ऐसी पतंग हम उड़ायें |
जिसमें अमन की बातें लिखीं हों,
ऐसी पतंग हम उड़ायें |
पतंगें क्या जानें कि सरहद कहाँ है,
किस ओर उड़ना, जाना कहाँ है?
इस ओर उड़ती है, कटती कहीं हैं,
कटकर न जाने, गिरती कहीं हैं,
जिस छत पे पहुंचीं, उसका क्या मज़हब,
मज़हब से आखिर, उनको क्या मतलब,
वो तो मुहब्बत का पैगाम लायीं,
होठों पे बच्चों के मुस्कान लायीं,
और कुछ उम्मीदों को खुशबू बनाकर,
उसमें था मैंने रखा छिपाकर,
जब सांस लोगे महसूस होगी,
उम्मीद तुझमें भी महफूज होगी,
तुमको भी आयेंगे सपने सुहाने,
जब न रहेंगे हम तुम बेगाने,
तेरी भी छत पर, मेरी भी छत पर,
फिर उस सुबह एक सूरज खिलेगा,
मुस्लिम मिलेगा मंदिर सजाते,
हिंदू अज़ानों को पढता दिखेगा,
गुपचुप सी कानों में बातें भी होंगीं,
ओस में लिपटी रातें भी होंगीं,
कोहरे छटेंगे आँखों से अपने,
उजले से होंगे मुहोब्बत के सपने,
जिस रोज नफरत की अर्थी उठेगी,
उस रोज धरती ये फिर से सजेगी,
होली की गुझियाँ बनेगीं तेरे घर,
ईद की सेंवई पकेगी मेरे घर,
फिर एक होंगे दोनों के झूले,
संग मिल के हम तुम अम्बर को छू लें,
जिसमें न कोई होगा पराया,
हर दिल में बेहतर इंसाँ समाया,
ऐसा जहाँ हम बनायें,
ऐसा जहाँ हम बनायें |

मुहब्बत के मांझे से कसकर बंधी हो,
ऐसी पतंग हम उड़ायें |
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7 Nov 2012

काश....

देखिये , कोई भी हंसेगा नहीं | ये प्यार-व्यार के बारे में हमसे लिखा नहीं जाता है | बहुत कोशिश करके कभी कुछ लिखा था  -



नजर खामोश रहती गर् जुबाँ कुछ बात कर पाती, 

कदम मासूम रहते जो तू हमारे साथ चल पाती ,

न जख्म यूँ पकता ,न तो नासूर यूँ बनते ,

गर् जख्म होती तू , तू ही मरहम लगा पाती !! 



मैं रात को छत पे सुकूं से नींद भर सोता , 

हर सुबह तू गर् प्यार से मुझको जगा जाती !! 


रहम मुझ पर भी होता उस खुदा का टूट कर हरदम , 

तेरी नजरो की रहमत गर् मुझे इक बार मिल जाती !! 


महकता सा मुझे महसूस होता कुदरत का हर जर्रा , 

तेरी साँसों की खुशबू जो मेरी साँसों में बस जाती !! 


मैं राह पर मुड़ – मुड़ के तुझको देखता था “काश...” , 

गली के मोड़ पर मुड़ने से पहले तू भी मुड़ जाती !!
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31 Oct 2012

प्रियतम का प्यार - हास्य कविता ?

कहा जाता है , खुद अपना ही मजाक उड़वाते समय एक जोकर अपना चेहरा सिर्फ इसलिए रंग लेता है ताकि उसके चेहरे पर छिपे दर्द कोई देख न ले | ज़रा कल्पना कीजिए , कैसी होगी उसकी जिंदगी जो खुद अपने ही मरने की दुआएं मांग रहा है | शायद नर्क से भी बदतर |
हमारे समाज में स्त्री को हमेशा सिखाया जाता है कि पति ही उसका परमेश्वर है | उसे हर हाल में अपने भगवान की आज्ञा माननी है , उसकी सेवा करनी है | हमारी कविता की नायिका भी उसी 'अधूरी शिक्षा' की शिकार है | मुक्ति पाकर वो बहुत खुश है | अपने पति को ईश्वर मानते हुए और इस पूरी सोच और समाज पर दर्द भरा 'कटाक्ष' करती हुई वो अपनी कहानी सुनाती है -



सारी रात प्रियतम हमरे ,
दिल लगाकर पीटे हमको ,
फर्श पोंछने का दिल होगा ,
चोटी पकड़ घसीटे हमको ,
गला दबाया प्यार से इतने ,
अँखियाँ जइसे लटक गयीं हो ,
गाली इतनी मीठी बांचे ,
शक्कर सुनकर झटक गयी हो ,
पिस्तौल दिखा रिकवेस्ट किये ,
हम और किसी को न बतलायें ,
हम ; मन में ये फरियाद किये ,
ये प्यार वो फिर से न दिखलायें | |

वो तो अपनी सारी चाहत ,
सिर्फ हमीं पर बरसाते थे ,
चाय से ले कर खाने तक की ,
तारीफें ; मुक्कों से कर जाते थे ,
रोज रात को शयन कक्ष में ,
सुरपान नियम से करते थे ,
फिर देवतुल्य अपनी शक्ति का ,
हमें प्रदर्शन करते थे ,
कसम से इतने वीर थे वो कि ,
हम तुमको क्या-क्या बतलायें ,
बस मन में ये फरियाद किये ,
ये प्यार वो फिर से न दिखलायें | |

हम ही ससुरी पगली थीं ,
जो प्यार से उनके ऊब गयी थीं ,
उनके कोमल झापड़ की ,
उन झंकारों में डूब गयीं थीं ,
एक रोज हम दीवानी ने भी ,
अपना स्नेह ; उन पर लुटा दिया ,
उनके प्यारे मुक्के के बदले ,
उनको भी झापड़ जमा दिया ,

अब इतना सज्जन मानव आखिर ,
ये कैसे स्वीकार करे ,
उसके निस्वार्थ प्यार के बदले ,
पत्नी भी उसको प्यार करे ,
बस ठान लिया उसने मन में ,
हमको सर्वोच्च प्रेम-सुख देगा ,
हम मृत्यु-लोक(पृथ्वी) में भटक रही थीं ,

हमको परम मोक्ष वो देगा ,

गंगाजल का लिया कनस्तर ,
फिर हम पर बौछार कराई ,
गंगा इतनी मलिन थीं हमको ,

केरोसीन की खुशबू आई ,
फिर अंततयः उस पाक ह्रदय ने ,
शुद्ध अग्नि में हमें तपाया ,
हमरी अशुद्ध देह जलाकर ,
सोने जैसा खरा बनाया ,


अब भी जाने कितने दानव ,
पति-परमेश्वर कहलाते हैं ,
हम भी शक्ति-स्वरूपा हैं ,
ये जाने क्यूँ भुल जाते हैं ,
पति भी तो अर्द्धांग है अपना ,
फिर , उसको क्यूँ ईश्वर कहते हैं ,
वो अपना पालनहार नहीं है ,
फिर , चुप रहकर क्यूँ सब सहते हैं ,
वो सुबह न जाने कब होगी ,
जब नारी स्वतंत्र हो पाएगी ,
भेद मिटेगा पति-पत्नी का ,
और प्यार से न घबराएगी |
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21 Sept 2012

स्वामी अब तो आ जाओ


जेठ की तपती दोपहर में सड़क पर एक आदमी उसे बुरी तरह पीट रहा था और बाकी तमाशबीन की तरह खड़े थे , मजे ले रहे थे | लेकिन वो थी कि जैसे उसे इस सब की आदत हो | बिना लोगों की तरफ ध्यान दिए वो सिर्फ उस सड़क की तरफ देख रही थी जो शहर की तरफ जाती थी | इस उम्मीद में कि शायद आज वो आएगा और उसे इस नर्क से बाहर निकालेगा -


कहाँ गए जी तुम बिन बोले , हम तुम्हरे बिन आधे हैं ,
दो पल में ही तोड़ दिए ; जो जनम-जनम के वादे हैं ,
बीत गए दस साल हैं तुमका ; स्वामी अब तो आ जाओ ,
ऐसा कौना काम है तुमका ; हमहूँ का बतला जाओ ,

तुम्हरी इक-टुक राह निहारें ; हम पग में ही हैं बैठीं ,
अँखियाँ हमरी रो-रोकर अपना परताप हैं खो बैठीं ,
हम कहतीं हैं स्वामी हमरे सहर गए हैं ; आवत हैं ,
सब हमका पगली बोलत हैं ; पीटत और बिरावत हैं ,
सब बोलत हैं पगली तुमका छोड़ गवा तुम्हरा स्वामी ,
राह अकारण तकती हो ; करती असुअन की नीलामी ,

झुठला दो इन सबका स्वामी , झलक एक दिखला जाओ ,
बीत गए दस साल हैं तुमका ; स्वामी अब तो आ जाओ ||


हमका कुछ भी नीक न लगे ; जग तुम्हरे बिन सूना है ,
तुम्हरे बिन मूरत कान्हा की ; जैसे एक खिलौना है ,
तुम्हरे बिन कुछ सूझत नाहीं ; कैसा दिन और कैसी रात ,
तुम्हरे बिन गेंदा निर-अर्थक ; निर-अर्थक सी है बरसात ,

पैंतीस बरस भी भये ना हमका ; हम पचपन की लगतीं हैं ,
सुध-बुध सारी खो बैठीं ; बस राह तुम्हारी तकती हैं ,
हमका तुमसे प्रेम बहुत है ; तुम ही एक सहारा हो ,
हमरी डूबी नैया का ; तुम्ही तो एक किनारा हो ,

हमरी नैया अब डूब रही ; आकार पार लगा जाओ ,
बीत गए दस साल हैं तुमका ; स्वामी अब तो आ जाओ ||
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1 Sept 2012

बस यूँ ही-५


नहीं तुमसे कोई शिकवा ; नहीं कोई शियाकत है ,

ज़रा सुन लो मेरी धडकन ; मेरी इतनी सी चाहत है ,

चाहे दूर रहना तुम ; मगर हंसतीं यूँ ही रहना ,

भले ही भूल जाना कि मुझे तुमसे मुहोब्बत है ||
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27 Aug 2012

आकाश के उस पार


“आकाश” के उस पार ,
Photo © Sahil Ahuja (http://pixels-memories.blogspot.in/)
कुछ छिपा हुआ सा है शायद ,
चलो घूमकर आते हैं ,

खिलती मुस्कानों के पीछे ,
कुछ दबा हुआ सा है शायद ,
चलो देखकर आते हैं ,

गहरा घुप्प अँधेरा है ,
पर एक किरण झिलमिल सी है ,
उसे उठाकर लाते हैं ,

नफरत तो काफी देख चुके ,
कुछ प्यार बचा है थैली में ,
आओ उसको फैलाते हैं ,

बादलों की ओट में ,
कोई रूठकर बैठा है शायद ,
जाकर उसे मनाते हैं ,

“आकाश” के उस पार ,
चलो घूमकर आते हैं ||
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