24 Nov 2013

आओ ढूंढें



खुशी से भरा एक जहाँ आओ ढूंढें ,

उम्मीदों भरा आसमां आओ ढूंढें |


जिसका महल खून से न रंगा हो ,

ऐसे खुदा का निशां आओ ढूंढें |

मुहब्बत हमारी जो खो सी गयी है ,

उसे अपने ही दरमियाँ आओ ढूंढें |

कागज के फूलों को कब तक सजाएं ,

गुलों से सजा गुलिस्तां आओ ढूंढें |

आँखों का पानी इधर ही गिरा था ,

शहर के शरीफों यहाँ आओ ढूंढें ||
.
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10 comments:

  1. उम्दा कहा है..

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  2. कहाँ थे पुत्र इतने दिनों!! बहुत अच्छी कविता है.. काश हर कोई ऐसा ही सोचे तो यह दुनिया उतनी बदसूरत न रहे जितनी है!! जीते रहो!!

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  3. आकाश बाबू सुंदर।

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  4. पहली बार पढ़ा आपको ...और सच कहूं आगे और भी पढ़ना चाहूंगी ..... शुभकामनाएं !

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (25-11-2013) को "उपेक्षा का दंश" (चर्चा मंचःअंक-1441) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. बहुत खुबसूरत लिखा है आपने |
    नई पोस्ट तुम

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  7. बहुत अच्छी सोच है आकाश .... आकाश तक पहुँचाने वाली .......

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  8. बहुत उम्दा रचना ...

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  9. .....bahut hi umda rachna ....welcome back bhai

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  10. आँखों का पानी इधर ही गिरा था ,

    शहर के शरीफों यहाँ आओ ढूंढें ||
    gazab likhte ho betu.. khush raho. likhte raho.
    .

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