6 Sept 2012

बस यूँ ही-८


वो जा रहे हैं ; अब , छींकना भी मुनासिब नहीं ,

मेरे बुजुर्गों का बनाया , ये भी एक दस्तूर है ,

इत्तेफाक से ही सही , कोई अनहोनी जो हो गयी ,

ता-उम्र सबसे बोलेंगे , ये मेरा ही कसूर है
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बस यूँ ही-७


कजरारी अंखियों का काजल गालों तक बह आया है ,

बिंदी मस्तक से खिसक गयी ; या फिर उसने खिसकाया है ,

क्या बोलू कुछ समझ न आये ; अधर शून्य से बैठे हैं

कई बरस के बाद मेरा जब यार नजर फिर आया है ||
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बस यूँ ही-६


मुझे कितनी मुहोब्बत है ;बता पाऊँ तुम्हे कैसे ,

भला मै खवाब इस दिल के दिखा पाऊँ तुम्हे कैसे ,

मेरी आँखों की पलकों में ; तेरी तस्वीर है साजन ,

मैं आँखें बंद करके भी भुला पाऊँ तुम्हे कैसे ||
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