कितने भी आराम के सुख साधन जुटा लीजिए , बचपन की वो बेफिक्र नींद फिर नहीं मिलने वाली | वो नींद जो आँखों की कोरों में सोती रहती है , हमारे उठने के बाद भी , वो नींद जो तकिये पर अपनी निशानी छोड़ जाती है , वो बेफिक्र नींद फिर नहीं मिलने वाली :(
झुकती सी अँखियाँ , जम्हाती बतियाँ , नाजुक से गालों पे तकिये की छाप , आँखों की कोरों , में नींदें सोयीं , होठों की कोरों से बहती सी लार | कुछ देर तक , नींद से लड़ना , फिर हार कर धम्म से तकिये पे गिरना , माँ का बुलाना , आवाज देकर , झुंझला के तकिये से कानों को ढंकना | कुछ देर सोना , सोने को रोना , जल्दी से एक ख्वाब , आँखों में बोना , फिर से , मैं हर रात , ये मांगता हूँ , वो नींद , इक रात , फिर से तो आये , सोऊँ मैं , फिर से , बच्चा हूँ जैसे , कोई ख्वाब , प्यारा सा , फिर से तो आये , मैं रात भर , कितना बेफिक्र सोया , फिर गाल पर उसकी निशानी दिखे , नींद पलकों पे बैठे , फिर ओस बनकर , खोलूं तो औंघाता पानी दिखे , दो मिनट देर तक , अब भी सोता हूँ पर , अब मुझे कोई आकर जगाता नहीं , कानों पे तकिया , रखता हूँ अब भी , प्यार से कोई उसको हटाता नहीं | फिर बुलाए कोई , फिर जगाये कोई , मुझको गोदी में फिर से , उठाये कोई , फिर कोई रात हो , मेरी माँ साथ हो , फिर मैं बचपन जियूं , उससे फिर जिद करूँ – “दो मिनट तो ठहर , माँ , मैं उठता हूँ न | ”