28 Jul 2013

आकर खुद अनुभव कर जाओ


एक चिट्ठी राम के नाम -


मूरत में बसने वाले राम ,

दुनिया में फिर आ जाओ ,

भूखे कैसे सोते हैं ,

आकर खुद अनुभव कर जाओ |



मगर जन्म लेना अबकी तुम ,

किसी गरीब के घर में ,

बचपन कैसे खोते हैं ,

आकर खुद अनुभव कर जाओ |



मंदिर के भीतर तुम अपनी ,

मूरत पाओगे ; संपन्न-सुखी ,

बाहर बच्चे क्यूँ रोते हैं ,

आकर खुद अनुभव कर जाओ |



रहकर दुनिया में देखो ,

तेरे नाम पे कितने क़त्ल हुए ,

लाशों को कैसे ढोते हैं ,

आकर खुद अनुभव कर जाओ |



एक बार ज़रा तुम भी टूटो ,

हालातों की मुट्ठी में ,

हम हिम्मत कैसे खोते हैं ,

आकर खुद अनुभव कर जाओ |



रामराज्य तो कहीं नहीं ,

रावण से बदतर हालत है ,

फिर भी कैसे खुश होते हैं ,

आकर खुद अनुभव कर जाओ |



भले अँधेरे फैले हों ,

पर दिल में रोज सवेरे के

हम सपने कैसे बोते हैं ,

आकर खुद अनुभव कर जाओ |

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22 Jul 2013

नींद

कितने भी आराम के सुख साधन जुटा लीजिए , बचपन की वो बेफिक्र नींद फिर नहीं मिलने वाली | 
वो नींद जो आँखों की कोरों में सोती रहती है , हमारे उठने के बाद भी , 
वो नींद जो तकिये पर अपनी निशानी छोड़ जाती है , वो बेफिक्र नींद फिर नहीं मिलने वाली :( 

 
झुकती सी अँखियाँ ,
जम्हाती बतियाँ ,
नाजुक से गालों पे तकिये की छाप ,
आँखों की कोरों ,
में नींदें सोयीं ,
होठों की कोरों से बहती सी लार |

कुछ देर तक ,
नींद से लड़ना ,
फिर हार कर धम्म से तकिये पे गिरना ,
माँ का बुलाना ,
आवाज देकर ,
झुंझला के तकिये से कानों को ढंकना |

कुछ देर सोना ,
सोने को रोना ,
जल्दी से एक ख्वाब ,
आँखों में बोना ,

फिर से , मैं हर रात , ये मांगता हूँ ,
वो नींद , इक रात , फिर से तो आये ,
सोऊँ मैं , फिर से , बच्चा हूँ जैसे ,
कोई ख्वाब , प्यारा सा , फिर से तो आये ,
मैं रात भर , कितना बेफिक्र सोया ,
फिर गाल पर उसकी निशानी दिखे ,
नींद पलकों पे बैठे , फिर ओस बनकर ,
खोलूं तो औंघाता पानी दिखे ,

दो मिनट देर तक ,
अब भी सोता हूँ पर ,
अब मुझे कोई आकर जगाता नहीं ,
कानों पे तकिया ,
रखता हूँ अब भी ,
प्यार से कोई उसको हटाता नहीं |

फिर बुलाए कोई ,
फिर जगाये कोई ,
मुझको गोदी में फिर से ,
उठाये कोई ,
फिर कोई रात हो ,
मेरी माँ साथ हो ,
फिर मैं बचपन जियूं ,
उससे फिर जिद करूँ –
“दो मिनट तो ठहर ,
माँ ,
मैं उठता हूँ न | ”
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26 Mar 2013

होली


होली, एक ऐसा त्यौहार जिसमें चेहरे पर लगा रंग सारे भेद मिटा देता है | होली के दिन सब हंसी-मजाक माफ होता है (बशर्ते कि वो दायरे से बाहर न हो) | 
काश कि हर दिन ऐसा ही खुशियों से भरा होता -

दोहा-

होली का असली मजा, यारों के संग आये|
और, 
इतना मलो गुलाल कि, रंग भेद मिट जाए|| 

धरती ने किया सिंगार , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
और, 
बरसे प्यार दुलार , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

सखियाँ बैठीं अवध की नगरिया , 
कान्हा के संग है सौतन मुरलिया , 
तभी.. 
आई बिरज से धार , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
सभी.. 
हो गयीं लालम-लाल , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

काहे रे पड़ोसी काहे इतना सरमाये , 
होरी के रंग से काहे खुद को बचाये , 
चल.. 
निकल दुआरे आ , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
हमरी, 
भौजी का सामने ला , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

आज नहीं कउनो छिपना-छिपाना , 
बीवी का रंग सारी को लगाना , 
हमरा.. 
सारी पे आधा अधिकार , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
बीवी.. 
गुस्से से हो गयी लाल , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

हम सब की महफ़िल मा भांग चले , 
हाँ जी, भांग चले , 
अरे, भांग चले, 
और, दद्दू की महफ़िल मा ज्ञान चले , 
भैया ज्ञान चले , 
आजहू , ज्ञान चले , 
आज.. 
ज्ञान को चूल्हे में डाल , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
दिल से.. 
दिल पे मलो गुलाल , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

संग मिल सबका हँसना-हँसाना, 
कउन है अपना , कउन बेगाना , 
रंग.. 
ढँक गया ये आकाश , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
रोज.. 
ऐसी खुशी हो काश , 
कि होरिया मा रंग बरसे | 

बरसे प्यार-दुलार, 
कि होरिया मा रंग बरसे | 
हाँ,, 
धरती ने किया सिंगार , 
कि होरिया मा रंग बरसे |
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सभी को होली की अग्रिम  और असीम शुभकामनायें |